Friday, October 21, 2011

उम्मीद में किया सरहद पार


“कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीड़। जो पर पीड़ ना जाने, सो काफिर बे पीर।।” दीवार पर लिखी इस पंक्ति को दिखाते हुए गोविंद राम कहते हैं, “हमारा धर्म पाकिस्तान में नहीं बचा है। हां, जो बचा पाए, उसे लेकर यहां आ गए हैं।” तब बगल में बैठी आरती ने तपाक से कहा, “वहां घर से बाहर निकलने पर लोग परेशान हो जाते थे, जबकि हमारी पढ़ने की बड़ी इच्छा जगती है। इसलिए यहां आए हैं। बड़े कहते हैं कि अक्षर ज्ञान होगा, तभी अक्ल आएगी।” आरती 13 वर्ष की है, पर सवालों का जवाब सयानी व समझदार लड़की की तरह देती है। उसकी मां सोनाली कहती है, “यह हमारी बड़ी लड़की है।” गहरी नींद में सोई दूसरी बच्ची की तरफ इशारा करते हुए कहती है, “यह दामिनी है। हमारी सबसे छोटी लड़की। तीन बच्चे और हैं। वे लोग टीवी देख रहे हैं।” यही है गोविंद राम बागड़ी का परिवार। हालांकि, बूढ़े मां-बाप वहीं पाकिस्तान में ही हैं। उन्हें छोड़कर पूरा परिवार भारत आया है। भरे मन से गोविंद कहता है, “उन्होंने तो अपनी जिंदगी करीब-करीब जी ली। हमने भी आधी काट ली, पर इन बच्चों की जिंदगी को खराब क्यों होने दें?”

दरअसल, गोविंद राम समेत कुल 19 हिन्दू परिवार के 114 सदस्य पाकिस्तान के सिंध प्रांत से दिल्ली आए हैं। सबकी परेशानी वही एक है, जिसे गोविंद राम ने अभी-अभी बताया है। फिलहाल डेरा बाबा धुणी दास आश्रम इनका ठिकाना है। इसे वे अपना पनाहगार मान रहे हैं। यह आश्रम दिल्ली के मजनू का टीला में स्थित है। अर्जुन दास बागड़ी जत्था में शामिल एक दूसरे परिवार का मुखिया है। उसने बातचीत में कहा, “हमलोग पिछले चार-पांच सालों से वीजा लेने की कोशिश कर रहे थे, पर नहीं मिल पाता था।“ फिर धीरे से कान में कहा, “भाई, वहां अमेरिका का वीजा मिलना आसान है, पर भारत का नहीं।” बातचीत में विश्वास का माहौल बना तो वे लोग खुले। बताया कि हम जैसे लोगों को वीजा मिलने में बड़ी कठिनाई आती है। वैसे तो धार्मिक यात्रा के नाम पर जत्थे को वीजा मिलना थोड़ा आसान है, पर किसी अकेले परिवार को मिलना बहुत मुश्किल है। आखिरकार हारकर हमलोगों ने भी यही रास्ता चुना। बड़ी मेहनत के बाद दिल्ली और हरिद्वार शहर का धार्मिक समारोह में शिरकत के लिए 35 दिनों का वीजा मिला था। पर उसकी तारीख गत आठ अक्टूबर को ही समाप्त हो गई है। कानूनन वे अब भारत में रहने के अधिकारी नहीं हैं, लेकिन पूछने साफ-साफ कह-बोल रहे हैं, “अब हमलोग उस दुनिया में नहीं लौटना चाहते जहां न तो हमारा धर्म सुरक्षित है और न ही हमारे बच्चे।”

जत्था में शामिल गुरमुख के परिवार में 21 सदस्य हैं। उसके माता-पिता भी साथ हैं। बातचीत के दौरान उसने बताया, “चार सितंबर को हमलोग ने बॉर्डर पार किया था।” उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद जो बात समझ में आई, वह इस तरह है- सितंबर की पहली तारीख को सुबह-सबेरे घर-बार छोड़कर वे लोग जत्थे में शामिल हो गए थे। तब यह जत्था एक ऐसे सफर पर था जिसका परिणाम किसी को मालूम न था। जत्था में कुल 600 लोग थे। आखिरकार चार सितंबर को जत्था बाघा बार्डर पार किया। इसके बाद वे लोग कई भागों में बंट गए। जिन्हें नागपुर का वीजा मिला था, वे नागपुर की तरफ चले गए। कुछ लोग इंदौर और भोपाल गए। कुछ लोगों के पास जयपुर का वीजा था। वे वहीं रह गए। यानी कुल नौ शहरों की तरफ इन लोगों ने रुख किया। इनमें 114 लोग दिल्ली आए। वे अब भी यहीं हैं। इनमें 48 बच्चे ऐसे हैं जिनकी उम्र सात वर्ष या उससे कम है। एक बालक ऐसा भी है जो जत्था में शामिल अपने परिवार का अकेला सदस्य है। उसकी उम्र 13 साल है। पूछने पर गुरमुख ने बताया कि इसके नाम का वीजा मिल गया तो मां-बाप ने यह कहकर भेज दिया कि वे पीछे से आ रहे हैं। अब यह हर पहर उनकी राह देखता रहता है। जत्था में शामिल एक किशोर का नाम कन्हैया लाल है और उम्र 16 साल। वह अपने पांच भाई-बहनों व मां-बाप के साथ वीजा पाने में तो सफल रहा, पर किस्मत उसके साथ दूसरा ही खेल खेल रही है। वह कैंसर से पीड़ित है और फिलहाल दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती है। मां-बाप बेहाल हैं। अब वे कन्हैया की देख-भाल करें या अपने अन्य पांच बच्चों को संभालें। खैर, यहां ऐसी और भी कहानियां हैं, पर इतना जानना जरूरी है कि सभी विस्थापित हिन्दू परिवार पाकिस्तान के सिंध प्रांत के हैदराबाद, मठियारी, हाला आदि स्थानों से यहां आए हैं।

इस लंबे सफर में उनकी जेब भी खाली हो गई है। हालांकि, खबर सुनकर मदद के लिए कई लोग आगे आए। खाने का सामान, बर्तन और बिस्तर उपलब्ध कराया है। इससे किसी तरह वे लोग अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। सहयोग के लिए ईश्वरदास मौजूद हैं। उनके पास पुराना अनुभव है। वे 1987 में पाकिस्तान से भारत आए थे। लंबे संघर्ष के बाद भारत में रहने की अनुमति पाई। अब वे राजस्थान के श्रीगंगानगर में रहते हैं। पूछने पर ईश्वरदास कहते हैं, “अब कोई क्या करे, मेरी नजरों के सामने इतिहास दोहरा रहा है। आज में 71 वर्ष का हूं। 24 साल पहले अपने बच्चों की हिफाजत के लिए यहां आया था। आज ये लोग आए हैं।” फिर आगे बताते हैं, “वहां के हालात बड़े खराब हैं। जबरन मजहबी तालीम दी जाती है। बच्चे उठा लिए जाते हैं। आप इनसे ही पूछो, बताएंगे।” साथ खड़े अर्जुन बागड़ी ने कहा कि वहां धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। अंतिम संस्कार भी नहीं करने देते हैं। हमारी लड़कियों के साथ भी अच्छा व्यवहार नहीं करते। शिकायत करने के बावजूद स्थानीय अधिकारी हमारी बात नहीं सुनते हैं। गोविंद राम ने कहा कि हाला में स्कूल और कॉलेज दोनों है। बच्चे पढ़ने जाना चाहते हैं। पर हम उन्हें स्कूल भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं।

खैर, वीजा की तारीख खत्म हो जाने के बाद इन लोगों का यहां रहना अवैध है, पर वे लोग चाहते हैं कि भारत सरकार मानवीय आधार पर उन्हें यहां रहने की अनुमति दे। इस बाबत वे कागजी प्रक्रिया में लगे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर तिमारपुर थाने तक अपनी अर्जी पहुंचा आए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक संपर्क साध पूरी जानकारी दे दी है। अब जवाब का इंतजार कर रहे हैं। यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (यूएनएचसीआऱ) के अनुसार वे लोग जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करते हैं वे रिफ्यूजी यानी शरणार्थी कहलाते हैं। तो क्या पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए इन हिन्दू परिवारों को शरणार्थी की संज्ञा दी जाएगी। हालांकि यह मामला यूएन बॉडी से जुड़ा है। पर वे लोग कहते हैं, “लोग तो हजार बातें करेंगे जी। हम भारत सरकार से इतना चाहते हैं कि वह हमें यहां कमाने-खाने की इजाजत दे ताकि हमारे इन बच्चों का भविष्य बन सके।” ह्युमन राइट लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) की 2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने 2005 से 2006 के बीच 13,000 पाकिस्तानी हिन्दू को भारतीय नागरिकता दी थी। गौरतलब है कि वर्ल्ड रिफ्यूजी सर्वे-2007 के अनुसार भारत में उस समय तक 4,35,000 शरणार्थी निवास कर रहे थे।

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